बज़्म

उर्दु ज़बान की चाशनी में घुली महफ़िल-ए-सुख़न

Saturday, April 16, 2005

चाँद और सितारे

डरते-डरते दमे-सहर से,
तारे कहने लगे क़मर से ।
नज़्ज़ारे रहे वही फ़लक पर,
हम थक भी गये चमक-चमक कर ।
काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना,
चलन, चलना, मुदाम चलना ।
बेताब है इस जहां की हर शै,
कहते हैं जिसे सकूं, नहीं है ।

होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या ?
मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या ?

कहने लगा चाँद, हमनशीनो !
ऐ मज़रअ-ए-शब के खोशाचीनो !
जुंबिश से है ज़िन्दगी जहां की,
यह रस्म क़दीम है यहाँ की ।
इस रह में मुक़ाम बेमहल है,
पोशीदा क़रार में अज़ल है ।
चलने वाले निकल गये हैं,
जो ठहरे ज़रा, कुचल गये हैं ॥

- इक़बाल

दमे-सहर - प्रभात
क़मर - चाँद
मुदाम - निरन्तर
मज़रअ-ए-शब - रात की खेती
खोशाचीनो - बालियां चुनने वालों
क़दीम - प्राचीन
बेमहल - असंगत
पोशीदा - निहित
क़रार - ठहराव
अज़ल - मृत्यु

6 तबसिरात:

Blogger Pratik said...

क्‍या बात है बज़्म की रंगीनियाँ गायब क्‍यों हैं? आज-कल बज़्म खाली क्‍यों है?

4:26 AM  
Blogger Pratik said...

मुनीश जी, आप कहाँ गायब हो गये हैं? नई ग़ज़लों का अब भी इन्‍तज़ार है।

5:08 AM  
Blogger qz284lu said...

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12:20 AM  
Anonymous Anonymous said...

Why is this called Urdu Poetry when there's nothing Urdu about it? It's all Hindi.

6:47 PM  
Blogger betee said...

munish ji kya papiha pyasi rahegi

4:01 AM  
Blogger Sarmad Pervaiz said...

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12:24 AM  

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